दैनिक जागरण के रविवारीय संस्करण में एक ही दिन
में तीन समाचार पढ़ने को मिले। पहला, गंगा पुनरोद्धार मंत्री उमाभारती की स्वच्छ
गंगा अभियान से लोक उपक्रमों के जुड़ने की अपील। दूसरा, जेटली करेंगे स्वच्छ भारत
के लिए फंड जुटाने की व्यवस्था। और तीसरा, सीवेज से सस्ती खाद बनाएगा बार्क। इन
तीनों खबरों को सम्मिलित रूप से देखें तो तीन बातें और स्पष्ट होती हैं। पहली,
भारत और गंगा को स्वच्छ करने की चुनौती बड़ी है। दूसरा, इस चुनौती की गंभीरता
हमारे मंत्रीगण भी समझ रहे हैं। और तीसरा, इस चुनौती का समाधान भी हमारे पास ही है
और वह बहुत महंगा, या बहुत मुश्किल नहीं है। बशर्ते नए साधन-संसाधन तलाशने के बजाय
अपने पास पहले से मौजूद साधनों, संसाधनों और संस्थानों की ओर देखा जाए और उन्हें
एक-दूसरे से जोड़कर काम करने का रास्ता निकाला जाए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता अभियान की
औपचारिक शुरुआत करने से पहले 15 अगस्त, 2014 को लाल किले से कचरे से कंचन तैयार
करने का आह्वान किया। दूसरी ओर देश के अग्रणी शोध संस्थान भाभा परमाणु अनुसंधान
केंद्र (बीएआरसी) के एक वैज्ञानिक डॉ.शरद काले ने उन्हीं दिनों मुंबई प्रेसक्लब
में पत्रकारों के समक्ष खुलासा किया कि किस तरह से शहर के कचरे को कंचन बनाया जा
सकता है। शरद काले की यह परियोजना वास्तव में बीएआरसी सहित कई स्थानों पर सफलतापूर्वक
प्रयोग में लाई भी जा रही है। बीएआरसी से बिल्कुल सटे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल
साइंस (टिस) के हॉस्टल की रसोई से निकलनेवाले जैविक कचरे को मीथेन गैस में बदलकर
पुनः उसी रसोई में खाना पकाने के लिए उपयोग किया जा रहा है। मुंबई आईआईटी सहित कई
और संस्थानों में ये प्रयोग अमल में लाया जा रहा है। डॉ. काले के अनुसार अनुमानतः
देश में करीब एक लाख टन जैविक कचरा निकलता है। जबकि एक टन कचरे को री-साइकिल कर
उससे 30 से 40 किलो मीथेन गैस एवं 50 से 60 किलो जैविक खाद तैयार की जा सकती है।
यदि इस प्रक्रिया से गैस का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाए तो उससे बिजली भी
तैयार की जा सकती है। कई जगह तैयार की भी जा रही है। काले का मानना है कि पहले चरण
में इसे देश के छात्रावासों, सरकारी कॉलोनियों, अस्पतालों, जेलों इत्यादि में शुरू
किया जा सकता है। क्योंकि ऐसे संस्थानों को आसानी से ये परियोजनाएं लगाने के लिए केंद्रीय
स्तर से निर्देश दिए जा सकते हैं और यहां से गीला व सूखा कचरा भी आसानी से अलग-अलग
इकट्ठा किया जा सकता है। बाद में इन संस्थानों की परियोजनाओं को मॉडल के रूप में
प्रस्तुत कर नगर व महानगरपालिकाओं को भी बड़ी परियोजनाएं लगाने के लिए प्रेरित
किया जा सकता है।
डॉ.काले जहां शहर से निकलनेवाले गीले व सूखे कचरे
का समाधान पेश करते हैं, वहीं बीएआरसी के ही रेडिएशन टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट डिवीजन
के प्रमुख डॉ. ललित वार्ष्णेय नालियों और नालों में बह रहे मल व कीचड़ (स्लज) की
समस्या को समाधान में बदलने का सूत्र बताते हैं। हम अक्सर देखते हैं कि हमारे शहर
की नगरपालिका का कोई कर्मचारी हमारे घर के बाहर बह रही नाली से काला-बदबूदार कचरा
निकालकर नाली के किनारे रखकर चला जाता है। काले कीचड़ का यह ढेर कुछ दिनों तक जस
का तस पड़ा रहता है। फिर कुछ दिनों बाद वही कर्मचारी हाथ गाड़ी में उसे भरकर कहीं
ले जाता है। शहरों का गंदा पानी नदियों की ओर जाने से पहले अब उन्हें सीवेज
ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से गुजारना अनिवार्य कर दिया गया है (हालांकि कई शहरों
और महानगरों में यह अनिवार्यता भी कागज़ी साबित हो रही है)। केंद्र सरकार ने
जगह-जगह एसटीपी इकाइयां स्थापित करने के लिए कई हजार करोड़ रुपए की योजना भी बनाई
है। ये एसटीपी इकाइयां भी वैसा ही काला-बदबूदार कचरा बड़े पैमाने पर निकालती हैं,
जैसा हमारे घरों के बाहर नगरपालिका का कर्मचारी निकालकर जाता है। एक अनुमान के
मुताबिक दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में प्रतिदिन 700 से 800 टन स्लज निकलता
है। इसे कहां फेंका जाए, यह महानगरपालिकाओं के लिए एक बड़ी समस्या रहा है। डॉ.
ललित वार्ष्णेय इस समस्या का समाधान प्रस्तुत करते हैं। सिर्फ 15 करोड़ की कुल
लागत वाला एक संयंत्र स्थापित कर प्रतिदिन 100 टन सूखे स्लज को कृषि उपयोगी जैविक खाद
में बदला जा सकता है। खाद भी ऐसी, जो एक रुपए प्रति किलो से भी कम कीमत पर किसानों
को उपलब्ध कराई जा सके। वह भी जरूरत के अनुसार नाइट्रोजन-फास्फोरस जैसे कई अलग-अलग
रूपों में। यानी शहरों का स्लज, समस्या नहीं, खेतों के लिए वरदान बन सकता है।
लेकिन बीएआरसी एवं इसके जैसे और भी कई संस्थानों
के हमारे काबिल वैज्ञानिकों द्वारा तैयार तकनीकें तब तक अनुपयोगी ही साबित होती
रहेंगी, जब तक हमारे नीतिनियंताओं की नजर उन तक न पहुंचे। वैज्ञानिकों की अपनी
सीमाएं और संकोच होते हैं। इन शोध संस्थानों की गोपनीयता भी कई बार जनोपयोगी तकनीक
के बाहर आने में बाधक बनती है। इनका उपयोग होता भी है तो इनकी खोज पर नजर गड़ाए
बैठा कोई पूर्णतया व्यावसायिक संस्थान इन तकनीकों को लेकर एक रुपए की चीज 200 रुपए
में बाजार तक पहुंचाता है। जबकि नेशनल प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कार्पोरेशन लि.
(एनपीसीसी) जैसा पहले से मौजूद कोई सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम (पीएसयू) अथवा कोई
नवगठित पीएसयू ऐसी तकनीक का उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर करना चाहे तो वह बड़े पैमाने
पर नवयुवकों को प्रशिक्षण देकर उन्हें ऐसी इकाइयों में रोजगार भी दे सकता है, और
हमारे शहरों को गंदगी से मुक्त भी करा सकता है। रही बात फंड जुटाने की, तो हाल ही
में आईसीआईसीआई बैंक की 60वीं वर्षगांठ पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने सभी निजी एवं
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से स्वच्छता अभियान से संबंधित उपक्रमों के लिए भी ऋण
उपलब्ध कराने का आह्वान किया है। यदि सार्वजनिक क्षेत्र का कोई उपक्रम स्वयं इस
क्षेत्र में सामने आने को तैयार हो, तो बैंकों को भी उसे फंड उपलब्ध कराने में कोई
ऐतराज शायद ही हो। यदि कोई केंद्रीय संस्थान किसी ठोस योजना के साथ शहर के कचरे को
जैविक खाद, उपयोगी गैस व बिजली तैयार करने के लिए आगे आए तो नगर व महानगरपालिकाएं
भी अपनी सुस्ती त्यागने को तैयार दिखाई देंगी। क्योंकि आम जनता से सबसे पहला सामना
महापौर, सभासदों और सरपंचों का ही होता है।
- ओमप्रकाश तिवारी

